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उज्जैन का परिचय

भारतीय संस्कृति की धरोहर, मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में एक उज्जयिनी, महाकाल की उपस्थिति से अत्यन्त पावन, महिमा मण्डित, विक्रम के शौर्य-पराक्रम से दिग्-दिगन्त में देदीप्यमान और कवि कुलगुरु कालिदास के काव्यलोक से सम्पूर्ण विश्व में गौरवान्वित नगरी है। स्कन्दपुराण में इसको ’प्रतिकल्पा’ के नाम से सम्बोधित किया है, जो सृष्टि के आरम्भ में उसकी उत्पत्ति का प्रतीक है। वेदों एवं उपनिषदों में भी उज्जयिनी का धार्मिक दृष्टि से सब जगह वर्णन किया गया है।

महाभारत काल में भारतवर्ष जब सौरव्य व उत्कर्ष के शिखर पर पहुँच चुका था। उस समय भी उज्जयिनी  का महत्व बहुत बढ़ा हुआ था और उज्जयिनी में एक प्रसिद्ध विद्यापीठ विद्यमान था। उज्जयिनी का वर्णन प्राचीन वाङ्मय के कवि और लेखकों की रचनाओं में भी पाया जाता है जैसे- कालिदास, बाण, व्यास, शूद्रक, भवभूति, विल्हण, अमरसिंह, परिगुप्त आदि। उज्जयिनी के धार्मिक पवित्रता का महत्व प्राप्त होने के निम्न विशेष कारण हैं। इसी तरह मोक्ष देने वाली सप्तपुरियों में से उज्जैन प्रमुख है।

 

सिंहाअवलोकन

प्रतिकल्पा नगरी उज्जैन को प्रति बारह वर्षा में सिंहस्थ कुम्भ महापर्व के आयोजन का पुण्य अवसर प्राá होता है । इस सुअवसर पर लाखो करोड़ो श्रद्धालुजन  एवं संत महात्माओं का आगमन यहाँ होता है । इन संत महात्माओं एवं श्रद्धालुजनो  को समुचित आदर्श, सत्कार एवं मुलभुत सुविधाएँ उपलब्ध  हो यह हम सभी का महान दायित्व है  । हम अपने इस दायित्व को पूर्ण विनम्रता एवं सद्भाव से निर्वहित कर सकें यही हमारा पुण्य होगा । हमारा यह सफल सतकर्म कुम्भ की अमृत बूंद होगी ।

 

उज्जैन की भोगोलिक  स्थिति एवं सिंहस्थ योग:-

वर्तमान उज्जयनी 75 डिग्री 50 अन्श पूर्व देशान्तर व 23 डिग्री 11 अंश उत्तर अक्षांश पर शिप्रा नदी के दाहिने तट पर समुद्र से 1698 फिट की ऊँचाई मालवा  के पठार पर स्थित है प्राचीन उज्जैन नगरी वर्तमान उज्जैन से 6 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर में थी जो आज गढ़कालिका के नाम से प्रसिद्ध है । उज्जैन के अक्षांश व सूर्य की कांति दोनों ही 24 अक्षांश पर मानी गई है । सूर्य के ठीक नीचे कि स्थिति उज्जयनी के अलावा संसार के किसी भी नगर की नहीं है ।

उज्जैन  में सिंहस्थ की विशेषता यह है कि कुछ निश्चित तिथियों और ग्रहों के युति बनने पर  सिंहस्थ योग होता है । अर्थात् सिंहस्थ के लिए अवन्तिका नगरी, वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, सिंह राशि में गुरु, मेष राशि में सूर्य, तुला राशि में चन्द्र, स्वाति नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि तथा व्यतिपात योग होना आवश्यक है । इन योगों के अनुसार गुरु बारह वर्ष के अंतराल में ही सिंह राशि में आते है और ऐसा योग होने पर  सिंहस्थ होता है ।

 

पुण्य सलिला शिप्रा

कालिकापुराण के अनुसार मेघातिथि द्वारा अपनी पुत्री अरुंधती के विवाह संस्कार के समय महर्षि वशिष्ठ को कन्यादान का संकल्पार्पण करने के लिए  शिप्रासार का जो जल लिया गया था उसके गिरने से शिप्रा प्रवाहित हुई । उज्जयनी में उत्तरवाहिनी शिप्रा दक्षिणमुखी महाकाल  का अभिषेक करती है । शिप्रा को मोक्षदायिनी भी कहा गया है ।

 

उज्जैन के पौराणिक नाम

उज्जयनी, प्रतिकल्पा, पदमावती,अवन्तिका, भोगवती, अमरावती,  कुमुदवती, विशाला, कनकश्रृंगा, कुशस्थली।

पूर्ण कार्य

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